NEW DELHI : 58 साल पुराना वो काला साया, जिसे मोदी सरकार ने दी ऊर्जा, अब सबकी है आरएसएस

नई दिल्ली। कहावत है कि अँधेरे के बाद उजाला जरूर आता है। वक़्त जरूर लगता है, लेकिन प्रकाश को कोई बांध नहीं सकता। ऐसा ही ऐतिहासिक फैसला लेते हुए देश की मोदी सरकार ने आरएसएस पर लगे 58 वर्ष पुराने प्रतिबन्ध को हटा दिया है। जिसके तहत सरकारी कर्मचारियों को आरएसएस के कार्यक्रमों और आयोजनों में जाने की अनुमति नहीं थी। नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली सरकार ने पिछले हफ्ते एक आदेश जारी कर आरएसएस की गतिविधियों में सरकारी अधिकारियों की भागीदारी पर लगे प्रतिबंध को हटा दिया। सरकार के इस फैसले पर सियासत तेज हो गई है। विपक्ष सरकार के इस कदम की आलोचना कर रहा है। भाजपा के आईटी विभाग के प्रमुख अमित मालवीय ने भी आदेश का एक स्क्रीनशॉट साझा किया और कहा कि 58 साल पहले जारी एक "असंवैधानिक" निर्देश को मोदी सरकार ने वापस ले लिया है।

मोदी सरकार के इस कड़े और बड़े फैसले को लेकर बेतुकी राजनीति शुरू हो चुकी है। विपक्षी नेता उन कर्मचारियों को देश सेवा के प्रकल्प से वंचित रखना चाहते हैं, जिसे वो हृदय से करना चाहते हैं, लेकिन 1966 में कांग्रेस सरकार का तुगलकी फरमान, जिसे 58 साल ढोया गया। इससे बड़ी विडम्बना और क्या हो सकती है? क्या लोगों को अपने हृदय की बात नहीं सुननी चाहिए, क्या देश सेवा के लिए ऐसे फरमान अभिशाप नहीं हैं? क्या ये शीर्ष अदालतों नजर नहीं आता? बड़े अफ़सोस की बात है!

क्या बोलते हैं विपक्षी?

कांग्रेस महासचिव (संचार) जयराम रमेश ने आरएसएस की गतिविधियों में सरकारी कर्मचारियों की भागीदारी से संबंधित कार्मिक, लोक शिकायत और पेंशन मंत्रालय द्वारा जारी 9 जुलाई को एक कार्यालय ज्ञापन साझा किया। उन्होंने तंज कसते हुए कहा कि कानून तोड़कर जो हो रहा था वह अब नियमित हो गया है क्योंकि जी2 और आरएसएस के बीच तनाव बढ़ गया है। उन्होंने कहा कि 4 जून, 2024 के बाद, स्व-अभिषिक्त गैर-जैविक प्रधान मंत्री और आरएसएस के बीच संबंधों में गिरावट आई है। 9 जुलाई, 2024 को, 58 साल का प्रतिबंध हटा दिया गया, जो वाजपेयी के प्रधान मंत्री के कार्यकाल के दौरान भी लागू था। 

AIMIM सांसद असदुद्दीन औवेसी ने कहा कि महात्मा गांधी की हत्या के बाद सरदार पटेल और नेहरू की सरकार ने RSS पर प्रतिबंध लगा दिया। प्रतिबंध इसलिए हटाया गया क्योंकि उन्हें इस बात पर सहमत होना पड़ा कि वे भारतीय संविधान का सम्मान करेंगे, वे भारत के राष्ट्रीय ध्वज का सम्मान करेंगे और उन्हें अपना लिखित संविधान देना होगा और उसमें कई शर्तें थीं कि वे राजनीति में भाग नहीं लेंगे।

सरकारी कर्मचारियों के लिए ये एक स्वर्णिम आदेश है। रही बात विरोध करने वालों की, जिनका मन देश सेवा में होगा जायेंगे, जिनके पास समय का अभाव, शंका और कोई भय होगा वो नहीं जायेगा। आरएसएस किसी को जबरदस्ती नहीं ले जाने वाली, वहां जाने वाला स्वयं सेवक राष्ट्रभक्त और भारत माता का समर्थक, जनसेवक और मददगार होता है। यही आरएसएस का देश के प्रति समर्पण है। जिससे लोगों को चीड़ होती है।     

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