वर्तमान में दृण इच्छाशक्ति के साथ मजबूत बना भारत-पूरन डावर
देश आर्थिक स्वतंत्रता की लड़ाई लड़ रहा है, अर्थव्यवस्था ने बड़ी छलांग लगायी है विश्व की पाँचवीं बड़ी अर्थ व्यवस्था बन चुकी है आज लगभग 4 ट्रिलियन डॉलर की अर्थ व्यवस्था है 75 प्रतिशत की जीडीपी से देश बड़ रहा है, स्वच्छ भारत के तहत देश साफ़ हो रहा है टॉयलेट बन रहे हैं। ग़रीबों के लिये घर बन रहे हैं लेकिन नौकरियाँ कम हो रही हैं ? देश में सड़कों का जाल बिछ रहा, मेट्रो रेल का जाल बिछ रहा हा, रेलवे स्टेशन सुधर रहे हैं, आधुनिक ट्रेन देश में बन रही हैं एयरपोर्ट बन रहे हैं, वेस्टर्न एवं ईस्टर्न फ्रेट कॉरिडोर बन रहे हैं, मेक इन इंडिया के अन्तर्गत धीमी गति से सही औद्योगिक विकास हो रहा है लेकिन नौकरियाँ घट रही हैं ? युवा बेरोज़गार हो रहे हैं ? रक्षा उत्पादन भारत में हो रहा है हेलीकॉप्टर भारत में बन रहे है, मोबाइल भारत में बन रहे हैं लेकिन युवाओं बेरोज़गारी बड़ रही है ? मुद्रा लोन, आयुष्मान के अन्तर्गत चिकित्सा क्षेत्र का विकास हो रहा लेकिन बेरोज़गारी है?… जो लोग सिर्फ़ सरकारी नौकरी के सहारे हैं उनको निराशा लगनी ही है। सरकार का काम मुख्यतह आंतरिक और बाह्य सुरक्षा देना है बाक़ी कार्य प्राइवेट सेक्टर के हैं। सरकार को धीरे-धीरे जो स्वतंत्रता के समय वेलफेयर के लिये जॉब क्रिएट गये थे वापस निकालना ही होगा।
महंगाई का रोना रोते हैं, महंगाई पर बात नहीं होती। सबसे अधिक रोना पेट्रोल पर होता है। 2004 जब कांग्रेस सरकार आयी पेट्रोल 33.71 और डीजल 21.50 और 2014 में जब तक कांग्रेस सरकार में रही पेट्रोल 83.50 25 प्रतिशत से अधिक बड़ गया और 2014 से आज 2024 में मोदी कार्यकाल में 83 से 100 रुपये मात्र 20 प्रतिशत 10 साल में यानी मात्र 2 प्रतिशत हर साल बड़ा, लेकिन महंगाई का रोना है। बात दाल और अनाज पर करते हैं। किसान चाहते हैं उनका एमएसपी बड़े। आज भी भारत में कृषि उत्पाद विश्व में सबसे सस्ते हैं। प्याज़ लहसन पर महंगाई की बात करते हैं। देश का इससे बड़ा मज़ाक़ क्या हो सकता है। मंडी में 2 ट्रक ज़्यादा आ गये रेट गिर गया। आज 2 कम आये तो रेट बड़ गया। इसमें सरकार कहाँ से आ गयी। आज किसी चीज़ पर राशन नहीं सब कुछ ओपन में मिल रहा है, कोई लाइन नहीं हैं। जो आज भी ग़रीबी रेखा के नीचे है उन्हें अनाज दिया जा रहा है। फ़ूड सुरक्षा तो है, पड़ोसी मुल्कों का हाल देखें।
कुल मिलाकर रोज़गार बड़ रहें हैं, महंगाई सीमित है विकास होगा तो मुद्रा स्फीति भी बड़ेगी, अन्यथा अर्थव्यवस्था मंदी में चली जाएगी। अर्थ व्यवस्था बड़ रही है। नौकरियाँ सरकारी अर्द्ध सरकारी बैंकिंग कुल मिला कर मात्र 7.3 प्रतिशत जो युवा इसके सहारे अपनी ज़िंदगी जीना चाहते हैं उनके लिए 92.7 प्रतिशत की ज़िंदगी सरकारों को कोसते निकल जायेगी। अभी तक विलायती बबूल के पेड़ लगाये गये तो, आम कहाँ से मिलेंगे। पेपर की डिग्री दे दी गयी। पारंपरिक हुनर छीन लिये गये। दिमाग़ में नौकरी भर दी गई .. मूल भूल गये।
उत्तम खेती माध्यम बान निषिध चाकरी भीख समान।
(पूरन डावर)
लेखक
वरिष्ठ उद्योगपति/समाजसेवी और चिंतक हैं

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