आगरा कॉलेज के बोर्ड ऑफ़ ट्रस्टी सुभाष ढल ने डॉ. अनुराग शुक्ला पर लगाए गंभीर आरोप
-डॉ. अनुराग शुक्ला ने फर्जीवाड़े से प्राप्त किया प्राचार्य पद
-आयोग में जमा किए फर्जी प्रमाण पत्र
-प्रबंध समिति ने जाँच कर किया फर्जीवाड़े का खुलासा
-प्राचार्य पद का प्रबंध समिति ने नहीं दिया चार्ज
आगरा। वर्ष 2021 में आगरा कॉलेज में आयोग द्वारा प्राचार्य पद पर नियुक्त किए गए डॉ. अनुराग शुक्ला पर कॉलेज ट्रस्टी सुभाष ढल ने होटल आशादीप भगवान टॉकीज पर एक प्रेससवार्ता कर गंभीर आरोप लगाए हैं। साथ ही उन्होंने डॉ. शुक्ला की आयोग द्वारा प्रमाण पत्रों की जाँच किए बिना नियुक्त किए जाने पर आयोग को भी सवालों के घेरे में लिया है। इस पूरे प्रकरण पर न सिर्फ उन्होंने खुलकर बोला, बल्कि प्रमाण पत्रों की प्रतियां आरटीआई की सूचना साझा करते हुए डॉ. शुक्ला की साजिश को अपराधन घोषित किया है। इस पूरे प्रकरण की सम्पूर्ण जानकारी बिंदुवार कुछ इस प्रकार है।
आगरा कॉलेज ट्रस्टी सुभाल ढल के अनुसार आगरा के नागरिक और सरकार द्वारा नामित आगरा कॉलेज, आगरा के बोर्ड ऑफ़ ट्रस्टीज के सदस्य होने के कारण हम सभी का कर्तव्य हो जाता है कि आगरा कॉलेज को गर्त में जाने से बचाएँ। लगभग तीन वर्ष पहले मदन मोहन मालवीय कॉलेज कालाकांकड, प्रतापगढ़ के स्नातक स्तर के संस्कृत विभाग के एक शिक्षक डॉ. अनुराग शुक्ला नामक व्यक्ति ने उच्चतर शिक्षा सेवा आयोग में प्राचार्य पद पर नियुक्ति पाईं। सामान्यतः आयोग को अभ्यर्थियों द्वारा नियुक्ति की अर्हता साबित करने के लिए लगाए गए सभी लैक्षणिक साक्ष्यों एवं अनुभव प्रमाण पत्रों का सत्यापन कराकर ही अर्ह पाये जाने पर नियुक्ति हेतु संस्तुत करना चाहिए। यदि उच्चतर शिक्षा आयोग न करा सके तो चयनित अभ्यर्थियों के दस्तावेज प्लेसमेंट अधिकारी निर्देशक, उच्च शिक्षा द्वारा सत्यापन होना चाहिए। डॉ. शुक्ला के मामले में ऐसा कुछ भी नहीं किया गया। प्राचार्यों की चयनित सूची में पहला स्थान पाये डॉ. अनुराग शुक्ला ने 2021 में आगरा कॉलेज ज्वाइन किया, लेकिन उस समय भी उनके द्वारा नियमानुसार अपने चयन में लगाये गये सभी शैक्षणिक दस्तावेजों एवं अनुभव प्रमाण पत्र नियोक्ता संस्था आगरा कॉलेज प्रबंध समिति के समक्ष नहीं प्रस्तुत किए गए। नियुक्त प्राचार्यों शिक्षकों के शैक्षणिक अभिलेखों की पत्रावली की छायाप्रति शासन द्वारा संबंधित महाविद्यालय को भेजी जाती है किंतु डॉ. अनुराग शुक्ल ने संभवतः ऐसा नहीं होने दिया।
जब गंभीर वित्तीय एवं प्रशासनिक अनियमितताओं में संलिप्त होने के कारण था, यह जानकर आगरा कॉलेज जैसे प्रतिष्ठित संस्था के प्रशासन में अक्षमताएँ सामने आई तो शासन और प्रबंध समिति द्वारा इनका पक्ष सुनते हुए जाँच कराई गई और इनमें घोर अनियमिताएँ पाई गई। शासन ने इन्हें निलंबित कर विस्तृत जाँच कराने का निर्णय लिया और उसी के अनुरूप प्रबंध समिति अध्यक्ष ने संस्था हित में इन्हें निलंबित किया।
प्रबंध समिति द्वारा इस बीच हॉ.पी.बी. झा के नेतृत्व में चार सदस्यों की एक आंतरिक समिति गठित की जिसने उपलब्ध दस्तावे का परीक्षण कर जाँच में उठाये गये बिंदुओं पर अपनी रिपोर्ट दी है। समिति ने प्रबंध समिति को निलंबित प्राचार्य द्वारा प्रबंध समिति की बैठक के मिनट्स सहित अनेक महत्वपूर्ण दस्तावेज उपलब्ध कराने का आग्रह किया। कमिश्नर द्वारा एवं वर्तमान प्राचार्य आगरा कॉलेज द्वारा इन्हें रिकॉर्डस उपलब्ध कराने के संबंध में लिखित निर्देश दिये, किंतु इन्होंने कई रिमाइंडर के बावजूद आज तक अनेक दस्तावेज उपलब्ध नहीं कराये हैं। यह नियोक्ता प्रबंध समिति के आदेशों की घोर अवहेलना है। यह न्यायालय के आदेश की भी अवहेलना है, जिसमें उनके विरुद्ध जाँच जारी रखने तथा सभी पक्षों को सहयोग करने के निर्देश दिये गये हैं।
दूसरा महत्वपूर्ण विषय यह है कि इनकी नियुक्ति की अर्हता से संबंधित है। आरटीआई से प्राप्त जानकारी से पता चला है कि जो दस्तावेज इन्होंने नियुक्ति की योग्यता सिद्ध करने के लिए और प्राचार्य जैसे गरिमामय पद पाने के लिए आयोग में प्रस्तुत किए थे, उनमें से अनेक फर्जी पाये जा रहे हैं। यह एक आपराधिक कृत्य है, जिसमें कानूनी करवाई, पदमुक्ति सहित जेल भेजे जाने का प्रावधान है।
सर्वप्रथम यह उस उच्चतर शिक्षा सेवा आयोग के साथ फ्रॉड और धोखाधड़ी है, जहां उन्होंने अपने दस्तावेज प्रामाणिक और सत्य होने का हलफनामा दिया है। दूसरे यह उच्च शिक्षा विभाग और उच्च शिक्षानिर्देशालय को गलत सूचना देकर नौकरी पाने की कारवाई और आपराधिक कृत्य है। तीसरे यह उन सभी अभ्यर्थियों के साथ छल, अन्याय और अवसर की समानता तथा मेरिट आधारित चयन प्रणाली के साथ धोखा है। प्राचार्य पद के वे अभ्यर्थी ठगे गये हैं जो डॉ. अनुराग शुक्ला से अधिक योग्य और अनुभवी थे, किंतु इन्होंने फर्जी दस्तावेज लगाकर स्वयं को सर्वाधिक योग्य घोषित करा लिया। किंतु सर्वाधिक धोखाधड़ी और जालसाजी इस संस्था आगरा कॉलेज आगरा और उसकी प्रबंध समिति के साथ किया है, जहां सभी सत्यानिष्ठा से कार्य करने का क्चन लेते हैं। नियोक्ता संस्था को धोखे में रख मिथ्या अथवा कूटरचित दस्तावेज प्रस्तुत कर तथा इनका सत्यापन छुपाक्न नौकरी में बने रहना आपराधिक धोखाधड़ी की श्रेणी में आता है, जिसके लिये भारतीय दंड संहिता में अनेक धाराओं के तहत सजा है। ऐसे व्यक्ति को पुनः प्राचार्य के रूप में बहाल करना, इन्हीं गलतियों की पुनरावृत्ति होती, संभवतः इसीलिए प्रबंध समिति ने इन्हें प्राचार्य पद का कार्यभार नहीं दिया है।
डॉ. अनुराग शुक्ला आदतन साजिशकर्ता और जालसाजी के उस्ताद हैं, मानो इन्होंने जालसाजी में ही पीएचडी की हो। यह सर्वविदित है कि मदनमोहन मालवीय कॉलेज का संस्कृत विभाग स्नातक स्तर का विभाग है जिसमें पीजी की पढ़ाई नहीं होती न ही इस विभाग को या इसके किसी शिक्षक को शोध कराने की अनुमति प्राप्त है। डॉ. अनुराग शुक्ल ने आगरा कॉलेज ज्वाइन करने के बाद अपनी सेवा पुस्तिका (सर्विस बुक) स्वयं तैयार की वह पुस्तिका जिसमें किसी प्राचार्य अथवा शिक्षक के समस्त शैक्षणिक एवं अनुभव अभिलेखों की प्रामाणिक एंट्री की जाती है। इस सर्विस बुक में इन्होंने स्नातक स्तर का शिक्षण अनुभव शून्य दर्शाया तथा उसकी जगह खुद के सापेक्ष 19 से अधिक वर्षों का स्नातकोत्तर (पीजी) का अध्यापन अनुभव स्वयं लिखा भी और उसे खुद सत्यापित भी कर लिया है। प्रतापगढ़ के कालाकाँकड़ के कॉलेज के दस्तावेज़ों के अनुसार उन्होंने संस्कृत विषय में एक घंटे भी पीजी अध्यापन नहीं किया है, क्योंकि वहाँ स्नातकोत्तर विभाग ही नहीं है। ये सारे तथ्य डॉ. अनुराग शुक्ला द्वारा छुपाकर प्रविष्टियाँ की गई है। अभी जाँच जारी है और आशा है इनके अन्य कई दस्तावेज और प्रमाणपत्र फर्जी निकलेंगे ।
तीसरा महत्वपूर्ण बिंदु इनके द्वारा आगरा कॉलेज के प्राचार्य के रूप में की अनियमितता, भ्रष्टाचार एवं धोखाधड़ी से संबंधित है। इन्होंने यह जानते हुए भी कि आगरा कॉलेज में सौ से अधिक वर्षों से एक स्टाफ क्लब के रूप में शिक्षक संगठन कार्यरत है जिसका भवन क्रीड़ांगन परिसर में आवंटित और स्थित है, अपने कुछ चहेते साथियों को वह बहुमूल्य ऐतिहासिक भवन सौंपने के उद्देश्य से एक फ़र्जी स्टाफ़ क्लब के गठन की अनुमति दी और गलत प्रमाणपत्र देकर निबंधन कराया। इस रजिस्ट्रेशन को सोसायटी रजिस्ट्रार और अपील न्यायालय के रूप में मंडलायुक्त्त आगरा ने धोखाधडी मानते हुए निरस्त कर दिया। इसमें मंडलायुक्त ने प्राचार्य की ग़लतबयानी और धोखाधड़ी को चिन्हित करते हुए इनके खिलाफ फैसला दिया है। कायदे से मंडलायुक्त को कॉलेज प्रबंध समिति के अध्यक्ष के रूप में इनके खिलाफ दंडात्मक करवाई करनी चाहिए थी।
इन्होंने नियोक्ता प्रबंध समिति के आदेशों का पालन न करते हुए महाविद्यालय संचालन से जुडी अनेक फ़ाइलें और दस्तावेज नहीं सौंपे हैं तथा यह अवज्ञा अभी तक जारी है।
अंत में सुभाष ढल ने कहा कि उक्त परिस्थितियों एवं बिंदुओं को ध्यान रखते हुए हमारी माँग सर्वप्रथम आगरा कॉलेज प्रबंध समिति से है कि इन्हें टर्मिनेट करने या सेवा समाप्त करते हुए इनके विरुद्ध आपराधिक मुक़दमा दर्ज कराई जाय। यही निवेदन प्रदेश शासन और मुख्यमंत्री महोदय से है कि इस प्रकरण में ऐसी करवाई की जाय जिससे कि कोई भविष्य में उच्च शिक्षा संस्थाओं, आयोग, आगरा कॉलेज के भविष्य के साथ खिलवाड़ न कर सके।










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