कमाल की बात! संविधान अभी भी खतरे में है?

18वीं लोकसभा चुनाव 2024 इतिहास का सबसे चर्चित, झूठे प्रोपगेण्डा से ओतप्रोत रहा। जिसमें मतदाता बुरी तरह फंसकर स्वविवेकहीनता का शिकार रहा और नतीजा मतदाता के साथ देश का भविष्य भी प्रभावित होने की कगार पर जा पहॅुचा। 2024 के लोकसभा चुनाव में मानवता, इंसानियत, शिष्टाचार, देशभक्ति, संस्कृति, संस्कार, धार्मिकता, एकता, अखण्डता, भाईचारा, सामाजिक गरिमा और न जाने क्या कुछ ताक पर रख प्रचार किया गया। मतदाओं को लुभाने के लिए झूठे वादे, गलत धारणा, भय का वातावरण और खतरे का आभास जैसे वातावरण की चेतावनी देकर लोगों का हकीकत से ध्यान भटकाया गया। 

2024 की लोकसभा के चुनाव के मात्र दो ही मुद्दे थे, पहला सत्तारूढ़ सत्ता के द्वारा विकास का, तो दूसरी ओर विपक्ष द्वारा संविधान खतरे और महिलाओं को लालचन खाते में पैसे भेजने का। इन परिस्थितियों में भारत के मतदाताओं का एक वर्ग इस झांसे में फंसा और उसने संविधान खतरे में है के अनिभिज्ञ खतरे के साथ पैसे के लालच में खुद के विवेक का स्थान नहीं दिया। इसे कढ़वा सच है, अब इसे मतदाता भी समझ चुका है और विपक्ष भी। लेकिन कहावत है कि अब पछताए का होत है, जब चिड़िया चुग गई खेत।’’

लोकसभा चुनाव में सारी अनैतिक क्रियाओं की पराकाष्ठा पार करने वाले दलों ने केवल और केवल अपना स्वार्थ साधा और मतदाताओं को भ्रमित कर उनका इस्तेमाल किया। ये देश के लिए बड़ी बिडम्वना है। पिछले एक दशक में देश की तस्वीर और तकदीर विश्व पटल पर सर्वोपरि रही है, इस सत्य को झुठलाया नहीं जा सकता। इकॉनॉमी से लेकर वर्चस्व में भारत दुनिया के लिए मिशाल बना। विश्व के शक्तिशाली देशों ने भारत के साथ दोस्ती कर खुद को गौरवान्वित महसूस किया। ये किसी विश्व विजय से कम नहीं हैं। भारत के इतिहास में आज तक ऐसा कभी नहीं हुआ, जब दुनिया का कोई भी देश भारत के साथ सम्बन्ध स्थापित करने को लालायित हुआ हो। ये भारत की ताकत है और देश की सरकार की विश्व विजयी कूटनीति भी। 

संविधान खतरे में कैसे था और अब भी

एनडीए के खिलाफ चुनाव मैदान में उतरी आईएनडीआईए ने जिन मुद्दों पर चुना लड़ा वो देश के लिए दुर्भाग्यपूर्ण रहे, जिसमें मतदाता भटक गया और पांच साल के लिए लटक गया। विपक्ष का प्रोपगेण्डा संविधान खतरे में है। भाजपा 400 पार के बाद संविधान खतरे में आ जाएगा। लेकिन चुनाव परिणाम के बाद एनडीए महज 240 पर सिमट गया, फिर भी विपक्ष को संविधान पर खतरा मंडराता नजर आया। 24 जून को संसद सत्र पहॅुचे विपक्ष ने संविधान हाथ में लेकर खतरे का डर जगाया और अपने मंसूबों को एक बार फिर लोगों का दिमाग घुमाने का कार्य किया। 400 पार पर मान सकते थे, लेकिन 240 पर भी संविधान खतरे में है, ये बात समझने से परे नजर आती है। 

आईएनडीआईए का डर या कुछ और!

आईएनडीआईए ने जो नेरेटिव 2024 के लोकसभा चुनाव में फैलाया कि एनडीए अगर 400 पार गई तो संविधान बदल देगी और एक जुलाई से महिलाओं के खाते में 8500 रुपए खटाखट आएंगे, ये दो बड़े प्रोपगण्डा जिन्हें भाजपा तोड़ नहीं पाई और 240 पर सिमट गई। दूसरी ओर मुस्लिम, दलित और छोटी जाति आईएनडीआईए के फैलाए गए झूठे प्रोपगण्डा के मोहजाल में फंस गई और स्वयं का नुकसान करा बैठी। संविधान बदलने का डर न पहले था और न 400 पार के बाद, न अब और न आगे होगा। ये राजनीति के अवसर हैं, जिन्हें पार्टियां और नेता अपने फायदे के लिए इस्तेमाल करते हैं। अब दूसरे नजरिए से सोचो कि जैसे भी हो सरकार एनडीए की बनी और देश में राशन, आवास, मेडीकल से लेकर तमाम सुविधाएं जिनका लाभ मुस्लिम, दलित, ओबीसी और अन्य गरीब उठा रहे हैं, क्या उन्हें ये सुविधाएं अब नहीं मिलेंगी। या फिर आईएनडीआईए उन्हें वो सब गारंटी पूरी करके देगी, जो उन्होंने चुनावी वादे में किए थे। नहीं न, तो फिर डर किस बात का था?

एनडीए अब और मजबूती से होगा खड़ा

लोकसभा चुनाव 2024 में बेशक एनडीए 400 पार नहीं कर पाया और उसकी उम्मीद के मुताबिक जीत नहीं हुई, तो क्या एनडीए विकास कार्य बंद कर देगा। लोगों राशन, आवास, मेडीकल और अन्य सुविधाएं बंद कर देगा। नहीं अपितु और मजबूती के साथ जनता के हित में फैसले लेकर विपक्ष के नेरेटिव को तोड़ जनता के बीच सच को उजागर कर अपनी छवि और कार्यकाल को पूर्ण करेगा। ऐसे में विपक्ष की जीत कहां है, ये केवल हार ही नहीं बड़ी हार है, जिसे वो और नए नेरेटिव के माध्यम से छुपाना चाहता है। जिस साश्वत को विपक्ष नकारता रहा आज उसी का गुणगान कर रहा है। ये सत्ता पक्ष की जीत ही कही जाएगी। वैसे विपक्ष मंे सत्ता विहीन होने के बाद भी अंदरूनी खींचातानी आज भी है, जो आने वाले कई राज्यों के विधानसभा चुनावों में मुखर रूप से देखने को मिलेगा। 


स्वार्थ से हटकर देश के विकास पर हो फोकस

चाहे सत्ता पक्ष हो या फिर विपक्ष दोनों को अपने हितों और स्वार्थ से ऊपर उठकर देश के समग्र विकास की परिकल्पना को मूर्त रूप देना होगा। जहां एनडीए को सबक मिला है, तो आईएनडीआईए को लाख कोशिशों के बावजूद सत्ता सुख नहीं मिला है। दोनों की उम्मीदें अधर में लटकी हैं। ऐसे में बेहतर यही होगा कि दोनों मिलकर कुछ ऐसा करें, जिसे इतिहास में याद रखा जाए। भारत को विश्व गुरू बनाने और विकसित देश की परिपाटी पर खरा उतरने के सार्थक कदम बढ़ाए जाएं। आम आदमी के सपनों का भारत बनाना ही पक्ष और विपक्ष का कर्तव्य हो नकि आपसी स्वार्थों के लिए खींचातानी।


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